High Court Big Decision: रिटायर शिक्षिका से ₹3,72,824 की रिकवरी का आदेश निरस्त, जानिए कोर्ट ने क्या कहा
बिलासपुर हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त सहायक शिक्षिका से 15 साल से अधिक पुरानी वेतन निर्धारण की कथित गलती के आधार पर ₹3,72,824 की वसूली के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने का कोई तथ्य नहीं है।

High Court Big Decision: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त सहायक शिक्षिका को बड़ी राहत दी है। जस्टिस बीडी गुरु की अदालत ने 15 साल से अधिक पुरानी वेतन निर्धारण की कथित गलती के आधार पर सेवानिवृत्त शिक्षिका से ₹3,72,824 की वसूली के आदेश को निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता तृतीय श्रेणी कर्मचारी थीं और रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने अधिक वेतन पाने के लिए धोखाधड़ी की, गलत जानकारी दी या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाया।
अदालत ने माना कि यदि अतिरिक्त भुगतान विभाग की ओर से हुई वेतन निर्धारण की गलती का परिणाम है, तो सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारी से वसूली नहीं की जा सकती।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त शिक्षिका सुधा वर्मा ने बिल्हा के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) की ओर से जारी 17 जून 2025 के रिकवरी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
इस आदेश के जरिए उन्हें कथित अतिरिक्त वेतन भुगतान के एवज में ₹3,72,824 जमा करने के लिए कहा गया था।
इसके अलावा उनकी अंतिम पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान को भी इस राशि के जमा करने से जोड़ दिया गया था।
विभाग की वेतन निर्धारण गलती बताकर मांगी गई रकम
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अतिरिक्त भुगतान उनके वेतन निर्धारण में विभाग की गलती के कारण हुआ था।
उनका कहना था कि उन्होंने अधिक वेतन हासिल करने के लिए न तो कोई गलत जानकारी दी और न ही किसी तथ्य को छिपाया।
याचिका के मुताबिक विभाग ने 15 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद वेतन निर्धारण में कथित गलती निकाली और इसके आधार पर रिकवरी का आदेश जारी कर दिया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, सेवानिवृत्ति के समय उन्हें नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी जारी किया गया था।
रिकवरी से पहले नोटिस नहीं देने का भी दावा
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि रिकवरी का आदेश जारी करने से पहले उन्हें कोई उचित नोटिस नहीं दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया।
उन्होंने हाई कोर्ट से रिकवरी आदेश को निरस्त करने और रोकी गई राशि तथा सेवानिवृत्ति लाभों को जारी करने की मांग की।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि वेतन निर्धारण के समय लिपकीय त्रुटि के कारण याचिकाकर्ता का वेतन अधिक निर्धारित हो गया था।
इसी वजह से उनकी सेवा अवधि के दौरान निर्धारित वेतन से अधिक राशि का भुगतान हुआ।
हालांकि, राज्य की ओर से भी ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो कि अतिरिक्त भुगतान हासिल करने में याचिकाकर्ता की ओर से धोखाधड़ी या गलत प्रस्तुतीकरण किया गया था।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद क्या कहा?
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि सुधा वर्मा तृतीय श्रेणी के पद पर कार्यरत थीं।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह पता चले कि उन्होंने धोखाधड़ी, गलत जानकारी या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर कथित अतिरिक्त भुगतान प्राप्त किया था।
कोर्ट के अनुसार, यदि अतिरिक्त भुगतान हुआ भी है तो प्रथम दृष्टया वह नियोक्ता यानी विभाग की ओर से हुई वेतन निर्धारण की गलती का परिणाम दिखाई देता है।
रफीक मसीह फैसले का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह फैसले में निर्धारित सिद्धांतों को महत्वपूर्ण माना।
इन सिद्धांतों के तहत कुछ परिस्थितियों में कर्मचारी को विभाग की वेतन निर्धारण संबंधी गलती के कारण हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली से संरक्षण मिलता है।
अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी रिकवरी आदेश को निरस्त कर दिया।
₹3,72,824 की रिकवरी का आदेश रद्द
हाई कोर्ट ने 17 जून 2025 को जारी रिकवरी आदेश को निरस्त कर दिया है।
हालांकि, अदालत ने विभाग को वेतन निर्धारण की नए सिरे से जांच करने की छूट दी है। इसके लिए याचिकाकर्ता को उचित और पर्याप्त सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली का सवाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार ही तय किया जाएगा।
6 महीने के भीतर राशि लौटाने का निर्देश
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि रिकवरी आदेश के आधार पर याचिकाकर्ता की कोई राशि वसूल या रोकी गई है, तो उसे जारी कर वापस किया जाए।
अदालत ने इसके लिए छह महीने की समय-सीमा निर्धारित की है।
इस फैसले से विभागीय वेतन निर्धारण की गलती के कारण लंबे समय बाद की जाने वाली रिकवरी से जुड़े मामलों में कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत का रास्ता साफ होता है।









