CG Teacher Promotion Scam: पदोन्नति आदेशों में संशोधन और पुरानी वेटिंग लिस्ट पर सवाल, जांच समिति की निष्पक्षता पर विवाद
बिलासपुर में युक्तियुक्तकरण और प्रधान पाठक पदोन्नति से जुड़े मामलों में शिकायतकर्ताओं ने प्रक्रिया, आदेशों में संशोधन और जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में समिति के निर्णय के बाद भी संशोधन आदेश जारी हुए और पदोन्नति में नियमों के पालन को लेकर भी सवाल खड़े हुए।

CG Teacher Promotion Scam: छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े विवाद एक बार फिर चर्चा में हैं। बिलासपुर में इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सामने आई शिकायतों और उपलब्ध जांच दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया की पारदर्शिता, जिम्मेदारी तय करने और जांच समिति की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया में विकासखंड स्तर से भेजी गई जानकारी से लेकर काउंसलिंग और संशोधन आदेशों तक कई स्तरों पर अनियमितताएं हुईं। वहीं, पदोन्नति आदेशों में भी निर्धारित समयसीमा और पदस्थापना को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
युक्तियुक्तकरण में संशोधन आदेशों पर सवाल
शिकायतों के अनुसार, कुछ मामलों में जिला और संभागीय स्तर पर युक्तियुक्तकरण अभ्यावेदनों को अमान्य किए जाने के बाद भी संशोधन आदेश जारी किए गए।
इस संदर्भ में संतोषी शर्मा, वंदना लहरे और जानकी चेलके के प्रकरणों का उल्लेख किया गया है।
अब विभागीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि सक्षम समिति किसी मामले को अमान्य कर चुकी थी, तो उसके बाद संशोधन आदेश किस अधिकार और किस प्रक्रिया के तहत जारी किए गए?
शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ, तो इसकी जिम्मेदारी तय कर संबंधित लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
पदोन्नति आदेशों में भी उठे सवाल
युक्तियुक्तकरण के साथ-साथ प्रधान पाठक पदोन्नति आदेश को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं।
शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, 27 दिसंबर 2024 के प्रधान पाठक पदोन्नति आदेश में निर्धारित अवधि के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर आदेश स्वतः निरस्त होने का प्रावधान था।
आरोप है कि अवधि समाप्त होने के बाद भी कुछ मामलों में संशोधन कर पदस्थापना का लाभ दिया गया।
शिकायत में हलधर प्रसाद साहू, रमेश कुमार साहू, शिप्रा बघेल, सूरज कुमार सोनी और ज्ञानचंद पांडेय सहित कई नामों का उल्लेख किए जाने की बात कही गई है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
पुरानी प्रतीक्षा सूची और पदस्थापना पर भी सवाल
शिकायतकर्ताओं ने पुरानी प्रतीक्षा सूची से पदोन्नति और सुविधाजनक स्कूलों में पदस्थापना को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
इन मामलों में वरिष्ठता, DPC (Departmental Promotion Committee) और काउंसलिंग की प्रक्रिया के पालन को लेकर आपत्तियां दर्ज कराए जाने की बात कही गई है।
सवाल यह है कि पदोन्नति और पदस्थापना में निर्धारित नियमों और वरिष्ठता सूची का कितना पालन हुआ और यदि कोई विचलन हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई?
फाइल और नोटशीट प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में
शिकायत में केवल अंतिम आदेशों पर ही नहीं, बल्कि फाइल तैयार करने और नोटशीट प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ विवादित प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में संबंधित शाखा के कर्मचारियों की भूमिका रही।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल सामने आता है—अगर किसी फाइल में नियम विरुद्ध प्रस्ताव तैयार किया गया, तो जिम्मेदारी केवल अंतिम आदेश जारी करने वाले अधिकारी की होगी या प्रस्ताव तैयार करने और उसे अनुमोदन के लिए आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए?
जांच समिति की निष्पक्षता पर क्यों उठे सवाल?
इस पूरे मामले में अब तीन सदस्यीय जांच दल की निष्पक्षता को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई गई है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, जांच समिति के कुछ सदस्य पहले विकासखंड स्तर पर गठित युक्तियुक्तकरण समितियों से जुड़े रहे हैं। शिकायत में बैरागी के तखतपुर विकासखंड समिति के सदस्य सचिव होने और दीप्ति गुप्ता के बिल्हा विकासखंड की समिति से जुड़े होने का उल्लेख किया गया है।
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि बैरागी को कथित गलतियों के संबंध में कलेक्टर स्तर से चार दर्जन से अधिक नोटिस मिले, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस सामग्री से नहीं होती।
यही वजह है कि शिकायतकर्ता जांच समिति की संरचना को लेकर हितों के संभावित टकराव (Conflict of Interest) का सवाल उठा रहे हैं।
उनका तर्क है कि जिस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, उसी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को जांच की जिम्मेदारी दिए जाने पर जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
‘बंजारा प्रेम’ को लेकर भी चर्चा, लेकिन दावों की पुष्टि बाकी
शिकायत में शिक्षा विभाग के एक प्रभावशाली अधिकारी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। विभागीय हलकों में कथित तौर पर यह चर्चा होने का दावा किया गया है कि सरकार और मंत्री बदलने के बावजूद कुछ अधिकारियों का प्रभाव लगातार बना हुआ है।
नीति, योजनाओं, स्थानांतरण, पदस्थापना और पदोन्नति जैसे संवेदनशील मामलों में संबंधित अधिकारी की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन दावों को केवल शिकायत और आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अधिकारी बदले, लेकिन विवाद बरकरार
बिलासपुर में जिला शिक्षा अधिकारी स्तर पर समय-समय पर प्रशासनिक बदलाव हुए हैं। प्रभारी व्यवस्था बनी, अधिकारी बदले और जिम्मेदारियां भी स्थानांतरित हुईं।
इसके बावजूद युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
इससे यह सवाल भी उठता है कि समस्या किसी एक अधिकारी तक सीमित है या फिर पूरी प्रक्रिया, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की श्रृंखला में सुधार की जरूरत है।
अब सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी किसकी?
युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े विवादों में सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि यदि जांच में किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी या प्रशासनिक चूक सामने आती है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्या केवल अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी की जवाबदेही होगी या फाइल तैयार करने, नोटशीट बनाने, प्रस्ताव आगे बढ़ाने और अनुमोदन की प्रक्रिया में शामिल सभी स्तरों की भूमिका की जांच होगी?
साथ ही, जांच समिति की निष्पक्षता को लेकर उठे सवालों का जवाब भी जांच की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।









