Dongargarh News: बमलाई, बम्लेश्वरी या बगलामुखी? डोंगरगढ़ की देवी के नाम पर फिर गरमाया विवाद
डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी के नाम और इतिहास को लेकर बहस फिर तेज है। गोंड समाज ‘दाई बमलाई’ की परंपरा का दावा करता है, जबकि 1864 के ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में ‘बगलामुखी देवी’ के उल्लेख का संदर्भ सामने आया है। जानिए पूरा विवाद।
Dongargarh News डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी के नाम और इतिहास को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। विवाद के बीच तीन नाम चर्चा में हैं—बमलाई, बम्लेश्वरी और बगलामुखी।
मामला केवल नाम तक सीमित नहीं है। इसके साथ डोंगरगढ़ की धार्मिक परंपरा, स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों के सवाल भी जुड़े हैं।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
विवाद की शुरुआत कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आए एक कथित बयान को लेकर हुई। कथित तौर पर देवी के नाम को भगवान शिव के डमरू से निकलने वाली ‘बम’ ध्वनि से जोड़कर बताया गया।
इस कथित कथन पर गोंड समाज ने आपत्ति जताई है। समाज की ओर से राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर कथन का खंडन, स्पष्टीकरण और माफी की मांग किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, कथित बयान के मूल वीडियो/संदर्भ और उसकी प्रमाणिकता को लेकर स्वतंत्र रूप से पुष्टि आवश्यक है।
गोंड समाज क्या कहता है?
गोंड समाज की मान्यता के अनुसार डोंगरगढ़ की देवी को पुरानी परंपरा में ‘दाई बमलाई’ के नाम से जाना जाता था। समाज का दावा है कि बाद के दौर में ‘बमलाई’ नाम का रूप बदलकर ‘बम्लेश्वरी’ के तौर पर प्रचलित हुआ।
इस दावे के समर्थन में धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के साथ डॉ. मोतीरावण कंगाली की पुस्तक ‘डोंगरगढ़ की बमलाई दाई बमलेश्वरी’ का भी हवाला दिया जाता है।
गोंड समाज के लिए यह मुद्दा केवल देवी के नाम का नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान और पुरानी परंपरा से जुड़ा विषय बताया जा रहा है।
हालांकि, लोकपरंपरा या समुदाय की मान्यता और किसी ऐतिहासिक तथ्य की प्रमाणित पुष्टि अलग-अलग चीजें हैं। इसके लिए प्राथमिक ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखों की जांच जरूरी होगी।
1864 के रिकॉर्ड में आया ‘बगलामुखी देवी’ नाम
विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों में अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि 1864 के डोंगरगढ़ के संदर्भ में ‘बगलामुखी देवी’ के सम्मान में रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार का उल्लेख मिलता है।
अगर इस रिकॉर्ड का मूल दस्तावेज और उसका संदर्भ इस तरह ही प्रमाणित होता है, तो यह डोंगरगढ़ की धार्मिक पहचान के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री हो सकती है।
लेकिन केवल इस उल्लेख से यह साबित नहीं होता कि ‘बगलामुखी’ ही बाद में ‘बमलाई’ या ‘बम्लेश्वरी’ नाम में बदल गया। इन नामों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए अतिरिक्त प्राथमिक स्रोतों की जरूरत होगी।
आज आधिकारिक पहचान क्या है?
वर्तमान में डोंगरगढ़ के प्रसिद्ध मंदिर की पहचान मां बम्लेश्वरी मंदिर के रूप में है। छत्तीसगढ़ सरकार के राजनांदगांव जिला प्रशासन की वेबसाइट भी पहाड़ी पर स्थित मंदिर को Maa Bamleshwari Temple के रूप में दर्ज करती है।
मां बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट भी पहाड़ी पर स्थित मंदिर को बड़ी बम्लेश्वरी और नीचे स्थित मंदिर को छोटी बम्लेश्वरी के नाम से दर्ज करती है।
यानी वर्तमान धार्मिक व्यवस्था और सरकारी पर्यटन पहचान में ‘बम्लेश्वरी’ नाम स्पष्ट रूप से प्रचलित और स्थापित है।
तीन नाम, लेकिन इतिहास का सवाल अब भी बाकी
इस पूरे विवाद में फिलहाल तीन अलग-अलग संदर्भ सामने आते हैं—
| नाम | आधार/संदर्भ |
|---|---|
| दाई बमलाई | गोंड समाज की लोकपरंपरा और सांस्कृतिक मान्यता |
| बगलामुखी देवी | 1864 के ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में बताए गए उल्लेख का संदर्भ |
| मां बम्लेश्वरी | वर्तमान मंदिर और सरकारी/आधिकारिक धार्मिक पहचान |
इन तीनों नामों को एक ही ऐतिहासिक क्रम में जोड़ने वाला निर्णायक और सार्वजनिक रूप से स्पष्ट प्राथमिक दस्तावेज अभी सामने नहीं है।
आखिर सच क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बगलामुखी, बमलाई और बम्लेश्वरी एक ही देवी के अलग-अलग समय में प्रचलित नाम हैं? या फिर इन नामों के पीछे अलग-अलग धार्मिक और स्थानीय परंपराएं रही हैं?
इसका जवाब किसी एक कथा, सोशल मीडिया पोस्ट या मौखिक दावे से तय करना मुश्किल है।
इसके लिए पुराने राजकीय दस्तावेज, मंदिर के अभिलेख, ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड, पुरातात्विक प्रमाण और स्थानीय समुदायों की मौखिक परंपराओं को एक साथ देखना होगा।
विवाद से ज्यादा जरूरी है प्रमाण
डोंगरगढ़ की देवी का इतिहास आस्था से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए किसी भी नाम की उत्पत्ति को अंतिम सत्य बताने से पहले उसके स्रोत और प्रमाण की जांच जरूरी है।
फिलहाल उपलब्ध सामग्री यह बताती है कि वर्तमान में मां बम्लेश्वरी नाम स्थापित है, जबकि गोंड समाज अपनी पुरानी परंपरा में ‘दाई बमलाई’ नाम का दावा करता है और ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में ‘बगलामुखी देवी’ के उल्लेख का संदर्भ सामने आता है। इन तीनों के बीच ऐतिहासिक संबंध की पूरी कड़ी अभी शोध और प्राथमिक दस्तावेजों की मांग करती है।
Key Points
- डोंगरगढ़ की देवी के नाम को लेकर नई बहस शुरू हुई।
- विवाद पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आए कथित बयान के बाद बढ़ा।
- गोंड समाज ने कथित बयान पर आपत्ति जताई और स्पष्टीकरण/माफी की मांग की।
- समाज की परंपरा में ‘दाई बमलाई’ नाम का उल्लेख किया जाता है।
- डॉ. मोतीरावण कंगाली की पुस्तक को इस दावे के महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में बताया जाता है।
- 1864 के ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में ‘बगलामुखी देवी’ के उल्लेख का दावा सामने आया है।
- वर्तमान में मंदिर की आधिकारिक पहचान मां बम्लेश्वरी के रूप में है।
- तीनों नामों को जोड़ने वाले निर्णायक प्राथमिक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं।



